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हां मैं डॉक्टर कन्हैया कुमार हूं




नाज़िश हुमा क़ासमी 
जी बेहतरीन वक्ता, गंभीर बातें करके अपनी बात जनता तक पहुंचाने वाला, निडर, बेबाक मिलनसार, हंसमुख, तीखी छाप छोड़ने वाला डॉक्टर कन्हैया कुमार हूं, हाँ मैं सरकार की नाकामी पर उससे प्रश्न करने वाला, सांप्रदायिकता से स्वतंत्रता का नारा देने वाला, भगवाइयों को भयभीत करने वाला, संविधान को बचाने के लिए प्रयास करने वाला, अल्पसंख्यक पर हो रहे अत्याचार के विरुद्ध आवाज उठाने वाला, सरकार की नाकामी गिनवाने वाला, "बिहार से तिहाड़ का लेखक", जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी का पूर्व छात्र नेता और बेगूसराय से भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी आफ इंडिया का लोकसभा उम्मीदवार कन्हैया कुमार हूं। मेरा जन्म 1987 में बिहार के बेगूसराय जनपद के बरोनी गांव के निकट विधानसभा के बेहट ग्राम सीपीआई के गढ़ में हुआ। मैं भूमिहार जाति से संबंध रखने वाला, मेरे पिता का नाम जयशंकर सिंह है जो पैरालिसिस के मरीज हैं और लंबे समय से बिस्तर पर हैं। मेरी माता का नाम मीना देवी है जो आंगनवाड़ी में काम करती हैं और वहां से मिलने वाली थोड़ी आमदनी से इस काबिल बनाया कि आज मैं सैकड़ों नौजवानों के दिलों की आवाज बन कर उभरा हूं। मेरे दो भाई एक का नाम प्रिंस है जो अभी शिक्षा प्राप्त कर रहा है, दूसरा मणिकांत है जो असम की एक कंपनी में सुपरवाइज़र है। मेरी प्रारंभिक शिक्षा कक्षा 6 तक मसनदपुर में हुई उसके पश्चात बरौनी आर.के.के.सी. हाई स्कूल में दाखिल हुआ फिर मकामा में राम रतन सिंह कॉलेज में शिक्षा की प्यास बुझाई। 2007 में कॉलेज ऑफ कॉमर्स पटना से भूगोल की डिग्री प्राप्त की। कॉलेज ऑफ कॉमर्स में छात्र राजनीति में भाग लिया और एआईएसएफ में शामिल हुआ और एक साल बाद पटना में छात्र नेतृत्व के तौर पर चुना गया। पटना में शिक्षा के दौरान ऑल इंडिया स्टूडेंट फेडरेशन का मेंबर बना, पोस्ट ग्रेजुएट समाप्त करने के पश्चात दिल्ली की प्रसिद्ध यूनिवर्सिटी जेएनयू में अफ्रीकन स्टडीज़ के लिए प्रवेश लिया। 2015 मैं ऑल इंडिया स्टूडेंट फेडरेशन का पहला ऐसा मेंबर चयनित हुआ जो छात्र यूनियन के अध्यक्ष के पद के लिए चुना गया। और एबीवीपी, एनएसयूआई, एसएफआई जैसी छात्र संगठनों के उम्मीदवार को हराते हुए मैं जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी में छात्र यूनियन का अध्यक्ष चुना गया। 12 फरवरी 2016 के दिन संसद पर हमला करने वाले अफजल गुरु की बरसी पर एक प्रोग्राम था मीडिया के लोगों ने उस प्रोग्राम को कवरेज किया जिसमें मुझे और मेरे अन्य साथियों पर यह आरोप लगाया गया कि हम भारत विरोधी नारे लगा रहे थे और पाकिस्तानी झंडा लहरा रहे थे जिसके कारण 13 फरवरी 2016 दिल्ली पुलिस ने हम छात्रों को एसपीसी की धारा 124 ए. और 120 बी. के तहत गिरफ्तार कर लिया, पुलिस अदालत में हमारे विरुद्ध लगाए गए आरोपों को साबित न कर सकी, सबूत पेश न कर पाने के कारण 2 मार्च 2016 को मुझे जमानत पर रिहाई मिली। रिहाई के बाद मैं जेएनयू आया और एक जोश, जज़्बे और वलवले के साथ अपने सहयोगी दोस्तों जिसमें उमर खालिद, शहला रशीद उल्लेखनीय हैं के साथ सांप्रदायिक शक्तियों के विरुद्ध पूरी कट्टरता से उठा और सांप्रदायिक शक्तियों की नींद हराम कर दी। मैं फिरकापरस्तों के विरुद्ध बोलने के कारण आधुनिक भारत का स्वतंत्रता संग्राम सेनानी घोषित किया गया, बिहार के पिछड़े इलाके में पिछड़ेपन की जिंदगी गुजारने वाला संघर्ष का उदाहरण बन कर उभरा और मुझे दिव्यांग बाप के यह सबक "खामोशी इस दौर में तुम्हें जीने नहीं देगी, अगर जीना है तो कोहराम मचा दो" फिर मैंने जेएनयू केंपस में तिरंगा लहराते हुए आजादी का नारा लगाया और कहा "हम लेकर रहेंगे आजादी, आर.एस.एस. से आजादी, मनुवाद से आजादी, संघ परिवार से आजादी, हम लेकर रहेंगे आजादी, हां कहने की आजादी, ना कहने की आजादी, सुनसान सड़क पर आजादी, आधी रात को मांगू आजादी, बस में मांगू आजादी, मेट्रो में मांगू आजादी, हम लेकर रहेंगे आजादी, मनुवाद से आजादी, शोषण से भी आजादी, गरीबी से आजादी, भुखमरी से आजादी, है हक हमारा आजादी, हम लेकर रहेंगे आजादी, है जान से प्यारी आजादी, है प्यारी-प्यारी आजादी, सब मिलकर बोलो आजादी, सुन ले मोदी आजादी, आरएसएस सुन ले आजादी, तो मोहन भागवत से आजादी, मनुवाद से आजादी, तोड़फोड़ से आजादी, सूट-बूट से आजादी, लूट खसूट से आजादी, हम लेकर रहेंगे आजादी, है हक हमारा आजादी, हम लेकर रहेंगे आजादी, मांग रही पूरी आबादी आजादी आजादी,' और हमारा यह नारा आजादी उन नौजवानों के लिए हिम्मत और हौसले का कारण बना जो ख़ामोश थे, हमने नौजवान दिलों में रूह फूंक दी, अत्याचार से सहमे लोगों को इस नारा-ए-आजादी से हौसला मिला और वह हमारे कंधे से कंधा मिलाकर खड़े हो गए।
हां मैं वही कन्हैया कुमार हूं जिसकी आवाज को दबाने के लिए मेरी जुबान काट कर लाने वाले को 5 लाख के इनाम की घोषणा की गई है, मुझे गोली मारने के लिए 11 लाख के इनाम की घोषणा की गई है; लेकिन मैं डरा नहीं, सहमा नहीं, भयभीत नहीं हुआ, चुप नहीं हुआ बल्कि खुल्लमखुल्ला उन फिरकापरस्तों को ललकारता रहा और उनसे कहा तुम मुझे डरा नहीं सकते, तुम मुझे नहीं मार सकते, तुम बुजदिल हो तुम मुझे मार कर भी मेरी आवाज दबा नहीं सकते एक कन्हैया मरेगा उसकी जगह हजार कन्हैया पैदा होंगे जो क्रांति मैंने शुरू की है वह मेरे यहां से चले जाने के बाद भी तुम्हारा पीछा नहीं छोड़ेगी। हां मैं वही कन्हैया कुमार हूँ जिसने कहा था कि हमें भारत से नहीं भारत को लूटने वालों से आजादी चाहिए। हां मैं वही हूं जिसने प्रधानमंत्री के ट्वीट सत्यमेव जयते पर कहा था प्रधानमंत्री जी आप से बहुत से मतभेद हैं, लेकिन सत्यमेव जयते आपका नहीं देश का है, संविधान का है। मैं भी कहता हूं सत्यमेव जयते। हां मैं वही कन्हैया कुमार हूं जिसने नजीब की मां का साथ दिया, उसके ग़म में बराबर का शरीक रहा, और नजीब की बाजियाबी के लिए आवाज उठाता रहा, हां मैं जुनैद के कत्ल पर भी सिसका, रोया, तड़पा, सेक्युलरिज्म के इमामों की तरह चुप नहीं रहा। अख़लाक़ और पहलू खान के दर्दनाक क़त्ल के खिलाफ भी आवाज उठाई, जुनैद की लाश को भी देखकर सहम गया था और सोच लिया था कि इन सब ज़ुल्मों का बदला लेने के लिए मुझे उठना होगा और मैं पहली बार बिहार से जनरल डब्बे में धक्के खाता हुआ दिल्ली पहुंचा था; लेकिन इस बार जनता के अधिक वोटों से बेगूसराय के पिछड़े और सताए हुए जनता की मोहब्बतों के बल पर संसद में गरजूंगा और सरकार को कटघरे में खड़ा करके मजदूरों को इंसाफ दिलाने की कोशिश करूंगा, बेरोजगारों को रोजगार दिलाऊंगा। मेरे चुनावी ऐलान से ही फिरकापरस्तों में खलबली मची हुई है। जो दिल्ली टिकट प्राप्त करने के लिए जाया करते थे आज वह मारे डर और भय के दिल्ली अपना टिकट निरस्त कराने जा रहे हैं। जो बात बात पर दूसरों का पाकिस्तान जाने का सुझाव दे रहे थे आज मेरे ख़ौफ़ से मुंह छुपाए हुए हैं। उनके ख़ौफ़ ने यह स्पष्ट कर दिया है कि मैं कामयाब हो चुका हूं और मुझे उम्मीद है कि बेगूसराय की जनता अपने मताधिकार का प्रयोग करते हुए मुझे अपना नुमाइंदा चुन करके संसद में भेजेगी और मैं पूरी ताकत से मज़लूमों की आवाज बन कर उभरूँगा।

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