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बुर्का प्रतिबंध : भारतीय संस्कृति, संविधान व भौगोलिक दृष्टिकोण से सही या गलत ? :- अफ्फान नोमानी

Pic :  Zainab Rashid
चुनाव के वक्त शिवसेना द्वारा छोड़ा गया शगूफ़ा " बुर्का प्रतिबंध " का बहस शुद्ध रूप से राजनीति से प्रेरित है । भारत के पड़ोसी देश श्री लंका में बुर्का प्रतिबंध पर बहस हो और भारत जैसे देश में जहाँ मुस्लिमों से जुड़े हर वो मुद्दे जिसपर राजनीतिक पार्टी अपनी रोटीया सेकते हो वहाँ इस तरह के मुद्दों पर बहस होना स्वाभाविक है ।
भारत के इतिहास में आजतक किसी भी आतंकवादी घटना में बुर्क़ा का इस्तेमाल नहीं हुआ है। रेलवे स्टेशन हो या अन्य सरकारी एजेंसियों का दफ्तर हो बुरक़ापोश महिलाओं की तलाशी वैसे ही होती हैं जैसे अन्य महिलाओं की होती हैं। देश की सुरक्षा से कोई लेना-देना नहीं है। इसलिए भारत जैसे देश में बुर्का पर प्रतिबंध नहीं लगाया जा सकता , यह बात मैं भारत की भौगोलिक, राजनीतिक व धार्मिक महत्व के बुनियाद पर काफी मजबूती से कह सकता हूं । बुर्का पर प्रतिबंध हमारी देश की संस्कृति व सभ्यता के भी खिलाफ है । देश की संस्कृति व संविधान के रोशनी में भारतीय पहनावे पर एक लम्बी बहस है। अगर हम भारतीय दर्शन शास्त्र व भारतीय संस्कृति की रोशनी में भारतीय परिवेश व परम्परा का अध्ययन करें तो हमें मालूम होता है कि आदिकाल से भारतीय महिलाओं में घुन्घट का चलन है। यह एक प्रकार का परदा है। परपुरुषों की नजरों से बचने के लिए और अपनी अस्मिता को बचायें रखने के लिए भारतीय महिलाएं इसका प्रयोग करती थीं और कहीं न कहीं आज भी करती हैं। हिन्दुस्तान की बहुसंख्यक आबादी गांवों में बसता हैं जहाँ आज भी महिलाएं परपुरुषों की नजरों से परदा करती हैं। आज जिसे बुर्का कहा जा रहा है, वह एक लिबास है, पहनावा हैं जिसे पहनने से औरत के जिस्म का कोई हिस्सा दिखाई नहीं देता है ( हालांकि अब विभिन्न प्रकार के बुर्का बाज़ार में है लेकिन अपने पसंद व परम्परागत तौर पर पहनने ना पहनने का हक सिर्फ औरत को है ) दरअसल बुरके का मतलब परदा करना है, चाहें वो किसी भी धर्म की महिला हो, उसे चाहिए कि वह पराए मर्दों से परदा करें, चाहें तो वह इसका प्रयोग बुरके , दुपट्टा व साड़ी पहन घुन्घट आदि से कर सकते है। यह सिर्फ मुसलमान महिलाओं के लिए नहीं, बल्कि दुनिया की तमाम महिलाओं के लिए है। भारतीय महिलाएं अपनी अस्मिता की रक्षा के लिए परदा करती हैं तो इसमें परेशानी क्या है ? अगर बुर्का, दुपट्टा व साड़ी पहन घुन्घट का प्रयोग करती है तो दमन का प्रतीक कैसे हो गया ? और नग्नता मानवता का प्रतीक कैसे हैं ? यह हमारे दो सवाल का जबाव विरोधी के पास नहीं है।
दुनिया भर में महिलाओं के विचार के साथ इज्जत की भावना जुड़ी हैं। इज्जत और नग्नता के बीच कोई संबंध नहीं है। परदा हर महिलाओं का हक हैं। जो देश बुरक़ापोश महिलाओं को जेल में डालने की बात कर रहे हैं वो मानवाधिकार के खिलाफ है । वहां की सरकार को चाहिए कि अपने कानून की दायरा बढ़ाये। श्रीलंका अपनी देश की आन्तरिक सुरक्षा की नाकामी को बुर्का जैसे मुद्दों को उठा कर बच नहीं सकती हैं। श्रीलंका को देश की सुरक्षा के मद्देनजर अन्य अहम पहलुओं पर गम्भीरता से विचार -विमर्श करना चाहिए ना कि अपनी ही संस्कृति और सिद्धांत के खिलाफ जाकर अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मारना चाहिए जैसे कि फ्रान्स ने किया।
फ्रान्स जहाँ अप्रैल 2011 में बुर्का पर प्रतिबंध लगा कर अपनी ही संस्कृति और सिद्धांत के खिलाफ कार्य को अन्जाम दिया था आज कानुनन व्यक्तिगत आजादी की ढोल पिटने वाले फ्रान्स को अरब देशों व संयुक्त राष्ट्र संघ में कई बार मानवाधिकार के कसौटियों पर खड़ा न उतरने वाला देशों में करार दिया गया जिससे फ्रान्स को अरब देशों व संयुक्त राष्ट्र संघ में लज्जित होना पड़ा। दरअसल, पूरा यूरोप खुद अपनी संस्कृति को बचाने में नाकाम होता जा रहा है।
भारत के संदर्भ में पुरुष व महिलाओं के पहनावे का दायरा काफी व्यापक है। भारतीय महिलाओं के लिए पहनावा असल मुद्दा नहीं है। भारतीय महिलाओं की असल लड़ाई यह है कि महिलाएं अन्य पुरुषों की तरह रात में अपना कार्य सम्पन्न कर घर सही सलामत पहुँचे । बिना डर- भय के स्कूल, कालेज व विश्वविद्यालय में पढ़ सकें। महिलाओं की इज्जत पर कहीं से कोई खतरा न हो।
हमें लिबास- पहनावे से उपर उठ कर सोचने की जरूरत है, महिलाएं क्या पहने नहीं पहनें यह उनका अधिकार है। चुकि हमारा समाज पुरुषसत्तात्मक समाज है इसलिए ऐसे समाज में महिलाओं की गतिविधि व उनसे जुड़े अन्य मुद्दों पर हल्ला मचाया जाता है और समय-समय पर इस तरह के मुद्दों को हवा दी जाती हैं लेकिन हमारा समाज काफी व्यापक है यहां विभिन्न प्रकार के वेश-भूषा, परिवेश व विभिन्न प्रकार के भाषाएँ हमारी संस्कृति में निहित है जिसे किसी खास हिस्से को अलग करना भारतीय संस्कृति व सभ्यता के खिलाफ है। भिन्नताएं भारतीय संस्कृति की खूबसूरती है और इस खूबसूरती को बचाना सभी सभ्य भारतीय नागरिक की जिम्मेदारी है।
अफ्फान नोमानी कॉम्प्रिहेंसिव फिजिकल साइंस के लेखक , एसइआरएफ रिसर्च स्कालर व स्तम्भकार हैं।

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